गोपाल झा ,महोत्तरी, अषाढ २४ गते
“हाँ, ठीके हम देखलौ तागत रूपैयाक।“
ई वाक्य लिखैत कालम काँपैत अछि । कारण, ई केवल अनुभव नहि, हमर समयक सबसँ पैघ सामाजिक व्यंग्य अछि । ई ओ पीड़ाके स्वर अछि जे असंख्य गरीब बापक हृदयसँ निकलैत ओ नोर अछि जे बेटीक विदाइयक समय आँखिमे छलकैत अछि; ई ओ कटु सत्य अछि जे सभ देखैत अछि, मुदा स्वीकार करए सँ कतराइत अछि ।
कहल जाइत छल—“विवाह दू आत्माक मिलन होइत अछि ।“ आब सुनाइत अछि—“विवाह दू परिवारक आर्थिक हैसियतक मिलान होइत अछि । “पहिने कन्याकेँ देखल जाइत छल, आब बैंक बैलेन्स देखल जाइत अछि । पहिने संस्कार पूछल जाइत छल, आब सम्पत्ति । पहिने कुल–परिवारक चर्चा होइत छल, आब गाड़ी, प्लँट, नगद आ दहेजक सूची बनैत अछि । लगैत अछि, बेटी आब बेटी नहि रहल; ओ विवाह बजारक एकटा “पैकेज“ बनि गेल अछि । जतेक पैकेज भारी, ओतेक सम्मान । जतेक जेब खाली, ओतेक अपमान ।
गरीब बापक जीवनके सबसँ कठिन दिन बेटीक जन्म नहि, बेटीक विवाहक दिन बनि गेल अछि । बेटी जन्मैत अछि तँ समाज बधाइ दैत अछि; मुदा जखन विवाहक समय अबैत अछि तँ ओहि समाजक आँखि सीधा बापक जेब पर टिक जाइत अछि । एक–एक कठ्ठा खेत बिकैत अछि, माय अपन विवाहक गहना बेचैत छथि, बाप जीवन भरिके कमाइ निकालै छथि, भाइ अपन सपना त्यागैत अछि—तखन जा कऽ समाज कहैत अछि, “विवाह भव्य भेल ।
की ई भव्यता अछि? नहि । ई गरीब परिवारक मौन चीत्कार अछि ।
आश्चर्य तखन होइत अछि जखन मंच पर दहेज विरोधक भाषण देनिहार लोक स्वयं अपन पुत्रक विवाहमे “सम्मान स्वरूप सहयोग“ के सूची बनबै छथि । भाषणमे आदर्श, व्यवहारमे व्यापार । ई समाजक दोहरापन नहि तँ की ?
कोनो सभा सम्मेलनमे जकरा लग धन अछि, ओकरा पहिल पाँतिक कुर्सी भेटैत अछि । गरीब विद्वान् अन्तिम पाँतिमे बैसल रहि जाइत छथि, आ धनाढ्य अशिक्षित मुख्य अतिथि बनि जाइ छथि । फूलमाला सेहो ओतै जाइत अछि जतय नोटक सुगन्ध अबैत अछि ।
विद्यालय आ कॉलेजमे शिक्षा देल जाइत अछि—“ईमानदारी सर्वोत्तम नीति अछि ।“ मुदा विद्यार्थी बाहर निकलै छथि तँ समाज हुनका पढ़बैत अछि—“पहिने पैसा कमाउ, सम्मान अपने भेटत ।“ एहन विरोधाभास सँ पैघ व्यंग्य दोसर की होएत ?
न्यायक मन्दिरमे मूर्ति आँखि पर पट्टी बन्हने छथि, कारण न्याय सबहक लेल समान हो । मुदा समाजक लोक कहैत छथि—वकीलक फीस जतेक भारी, आशा ओतेक उज्ज्वल । ई धारणा सही हो वा गलत, मुदा ई धारणा बनल किएक? ई प्रश्न हमरा सभकेँ स्वयं सँ पूछबाक अछि ।
राजनीतिक सभामे आदर्शक नारा खूब गूँजैत अछि । मुदा चुनाव अबिते पोस्टर, ब्यानर, गाड़ी, भोज, प्रचार, भीड़—सभटा रूपैयाक बल पर दौड़ लगैत अछि । लोकमतक स्थान पर नोटमतक चर्चा शुरू भऽ जाइत अछि ।
आइ सम्मानक परिभाषा सेहो बदलि गेल अछि । चरित्रक स्थान पर सम्पत्ति, ज्ञानक स्थान पर वैभव, सेवाक स्थान पर प्रदर्शन, आ सादगीक स्थान पर आडम्बर बैसि गेल अछि । गरीब शिक्षक जीवनभरि हजारों विद्यार्थी गढ़ै छथि, मुदा हुनकर सम्मान एकटा धनाढ्य अतिथिक एक दिनक अभिनन्दन समारोहसँ छोट मानल जाइत अछि । व्यंग्य ई अछि जे समाज कहैत अछि—“धन हाथक मैल अछि ।“ फेर ओही समाज हाथक मैलकेँ माथ पर मुकुट बना लैत अछि ।
एकटा प्रश्न हमर सभसँ अछि—यदि बेटीक विवाहमे प्रेमसँ बेसी दहेजक महत्व रहत, यदि समाजमे चरित्रसँ बेसी सम्पत्तिके सम्मान रहत, यदि विद्यालयमे शिक्षासँ बेसी पहुँच चलत, यदि अदालत धरि गरीब अपनाकेँ कमजोर अनुभव करत, तँ हम अपन सन्तानकेँ की शिक्षा दऽ रहल छी <
शायद एहि लेल आइ बच्चा सेहो जल्दी बुझि जाइत अछि जे “सफलता“ आ “समृद्धि“मे अन्तर रहैत अछि । सफल ओ नहि जे केवल धन कमेलक; सफल ओ अछि जे सम्मान कमेलक । समृद्ध ओ नहि जे महल बना लेलक; समृद्ध ओ अछि जे मनुष्यक विश्वास जीतलक ।
इतिहास खोलि कऽ देखू । कर्ण अपन दानसँ अमर छथि, धनसँ नहि । महात्मा गाँधी लग धनक पहाड़ नहि छलनि, मुदा नैतिक बल संसारकेँ झुका देलक । विद्यापति आइओ पूजल जाइ छथि, कारण शब्द अमर होइत अछि, सम्पत्ति नहि । बेटी बोझ नहि, समाजक भविष्य छथि । हुनकर मूल्य दहेज नहि, हुनकर शिक्षा, स्वाभिमान, प्रतिभा आ संस्कार अछि । जँ विवाहकेँ फेरसँ संस्कार बनाबी, तँ गरीब बापक नोर सुखाएत, बेटीक सम्मान बचत, समाजक आत्मा पुनः जीवित होएत ।
अन्तमे फेर वेह वाक्य मोनमे अबैत अछि —
“हाँ, ठीके हम देखलौ तागत रूपैयाक..“
मुदा हम चाहैत छी जे आब अगिला पीढ़ी ई वाक्य नहि, ई कहए —
“हाँ, हम देखलियै तागत ईमानदारीके । तागत शिक्षाके । तागत संस्कारके । तागत मानवताके ।
ओहि दिन विवाह बजार नहि, उत्सव होएत । अदालत केवल न्याय देत । विद्यालय केवल चरित्र गढ़त । सभा–समाज केवल योग्यताक सम्मान करत । आ मनुष्यक मूल्य ओकर जेब सँ नहि, ओकर हृदयसँ नापल जाएत ।
ओहि दिन समाज सचमे सभ्य कहल जाएत ।







