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मिथिलाक संस्कृति, सभ्यता आ आत्मीयताक जीवित दस्तावेज , बिबाहक बरियाती

प्रतिक्षा खबर
२०८३ असार ६, शनिबार १८:४६

गोपाल झा , महोत्तरी , अषाढ गते

मिथिला केवल एकटा भौगोलिक क्षेत्र नहि, बल्कि हजारों वर्ष पुरान संस्कृति, सभ्यता, परम्परा आ सामाजिक मूल्यक जीवित धरोहर अछि । अतुका लोकजीवनमे जन्म सँ लऽ कय मृत्युपर्यन्त अनेक संस्कार सभ समाहित अछि , जाहिमे विवाह संस्कारके विशेष स्थान अछि । विवाह केवल दू व्यक्ति अथवा दू परिवारक मिलन नहि, बल्कि सामाजिक सम्बन्धक विस्तार आ सांस्कृतिक आदान–प्रदानके एकटा महत्वपूर्ण अवसर मानल जाइत रहल अछि ।

विवाहसँ जुटल “बरियाती“ मिथिलाक ओ सांस्कृतिक परम्परा अछि, जाहिमे लोकजीवनके सहजता, आत्मीयता, सामाजिकता आ सांस्कृतिक वैभवके अद्भुत संगम देखल जाइत अछि । मुदा बदलैत समय, आधुनिकता आ प्रविधिक प्रभावके कारण बरियातीक स्वरूपमे व्यापक परिवर्तन भेल अछि । किछु परिवर्तन स्वागतयोग्य अछि , मुदा किछु परिवर्तन एहन सेहो छेल अछि जे मिथिलाक मौलिक संस्कृति आ परम्पराकेँ प्रभावित कऽ रहल अछि ।    किछु दशक पहिने धरि मिथिलामे “बरियाती“ शब्द सुनिते लोकक मन प्रफुल्लित भऽ जाइत छल । गाममे कतौ विवाहक नेओता अबै छल तऽ लोक सभ , दिनके गनय लगैत छलाह । विशेष रूप सँ युवक वर्गमे बरियाती जयबाके उत्साह देखबाक योग्य होइत छल ।

ओहि समय सम्पन्न परिवारमे बरियाती तीन संझू धरि चलैत छल । पच्चीस सँ तीस गोटे बरियाती संग जाइत छल । बरियाती जयबा सँ पपहनहेँ घर–आँगनमे उत्सव जेकाँ माहौल बनि जाइत छल । परिवारक सदस्यसभ, नातेदार आ गामक लोक सभ मिलिकय तैयारीमे लागि जाइत छलाह ।

बरियाती जयबाक तैयारी केवल वस्त्र धारण करब मात्रे टा  नहि छल । ई एक प्रकारक सामाजिक प्रतिष्ठासँ सेहो जुटल विषय मानल जाइत अछि । बरियाती जयबा सँ दू–तीन दिन पहिनहि स्नान, सफाई आ श्रृंगारक विशेष व्यवस्था होइत छल ।

ओहि समय गमकौआ साबुन बहुत कम उपलब्ध छल । लोक सभ गाँमक पोखरिक निर्मल जलमे स्नान करैत छलाह । शरीरक सफाईक प्रति विशेष ध्यान देल जाइत छल । ताहि दिन सनलाइट साबुन सँ धोती, कुर्ता आ गमछा धो–धो कय चमकाओल जाइत छल ।

गाँमक दलानपर लगातार हजामके उपस्थिति रहैत छल । केस कटबय, दाढ़ी बनबय आ श्रृंगार करबामे लोक विशेष रुचि लैत छलाह । बरियातीमे सम्मिलित होयब सम्मानक विषय मानल जाइत छल ।        एम्हर मिथिलाक बरियातीके सबसँ आकर्षक पक्ष छल मिथिलाक पारम्परिक वेशभूषा । उज्जर धोती, सादा अथवा हल्का रंगक कुर्ता, काँँहपर गमछा आ माथपर लाल पाग ।

बरियातीक समूह जखन सड़कसँ गुजरैत छल तऽ दूरे सँ लोक पहचानि जाइत छल जे ई सभ बरियाती छथि । लाल पाग केवल वस्त्र नहि, बल्कि मिथिलाक सम्मान, प्रतिष्ठा आ सांस्कृतिक गौरवके प्रतीक मानल जाइत अछि ।

दुर्भाग्यवश आइ ई दृश्य बहुत कम देखबाक लेल भेटैत अछि । आधुनिक फैशनके प्रभावमे मिथिलाक पारम्परिक वेशभूषा धीरे–धीरे ओझराइत जा रहल अछि ।    अतबे नहि पहिनुका बरियातीक एकटा अत्यन्त महत्वपूर्ण परम्परा छल—“परिचय–पात्र“।

बरियातीमे सम्मिलित प्रत्येक व्यक्तिक नाम, गाम, गोत्र, पारिवारिक सम्बन्ध आदि परिचय–पात्रमे अंकित रहैत छल । एकर उद्देश्य केवल औपचारिक परिचय नहि, बल्कि भविष्यक लेल सामाजिक सम्बन्धके आधार निर्माण करब छल ।

बरियातीक माध्यमसँ बनल सम्बन्ध जीवन भरि निर्बाह कैल जाइृत छल । कहियो कतहू कोनो यात्रा, व्यापार, सामाजिक कार्यक्रम अथवा पारिवारिक अवसरपर भेट होइत छल तऽ परिचय–पात्रक माध्यमसँ बनल सम्बन्ध पुनः जीवित भऽ जाइत छल । आब सोशल मीडियामे हजारों मित्र छथि, मुदा आत्मीय सम्बन्धके अभाव स्पष्ट देखाइत अछि ।   मिथिलाक बरियाती भोजनके लेल सेहो प्रसिद्ध रहल अछि । पहिने केराके पातपर परोसल दही–चूड़ा, तरुआ, कढ़ी–बड़ी, घिउ, साग–सब्जी, अचार, पापड़, मिठाइ आ अन्य साकाहारी व्यंजन अतिथि सत्कारक प्रतीक मानल जाइत छल ।

भोजनमे स्वादसँ बेसी महत्व आत्मीयताक होइत छल । घरक लोक स्वयं उपस्थित भऽ कय आग्रह पूर्वक भोजन करबैत छलाह । अतिथि तृप्त भेल कि नहि, एहि बातके विशेष ध्यान राखल जाइत छल । मुदा आब केराक पातके स्थान कागजक प्लेट आ प्लास्टिक ल लेलक अछि । दही–चूड़ाक स्थान बजारक पैकेटबन्द नास्ता ल लेलक अछि । एहन नास्ता आ भोजनमे स्वाद बढ़ल हो वा नहि, मुदा आत्मीयता अवश्य कम भेल अछि ।  समय परिवर्तनशील अछि , समाज बदलैत अछि , जीवनशैली बदलैत अछि , बरियाती सेहो एहि परिवर्तनसँ अछूता नहि रहल ।

आब बरियातीमे जयसँ पहिनहि भोजनके सूची पूछल जाइत अछि । कतेको लोक तँ स्पष्ट रूपसँ कहैत छथि—“माछ–मांस नहि रहत तऽ हम बरियाती नहि जायब ।“ बर्तमान समयमे मोबाइल फोन आ सोशल मीडियाके प्रभाव सेहो बरियातीक स्वरूप बदलि देने अछि । पहिने लोक सम्बन्ध जोड़बा लेल बरियाती जाइत छलाह, आब फोटो खींचब लेल ।   पहिनुका समयमे मिथिलाक विवाह संस्कारमे महिलासभक भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण रहैत छल, मुदा हुनकर सहभागिता अपन सांस्कृतिक मर्यादा आ सामाजिक परम्पराक सीमामे रहैत छल । गाम–घरमे गीत–नाद, कोहबर, समदाउन, विवाहक विभिन्न संस्कार आ अतिथि सत्कारमे महिलासभक योगदान अनुपम मानल जाइत छल ।

मुदा वर्तमान समयमे महिलासभ प्रत्यक्ष रूपसँ आब बरियातीयोमे सम्मिलित होमय लागल छथि । एक दिस एकरा महिलाक सामाजिक सहभागिता आ स्वतन्त्रताक प्रतीक मानल जा रहल अछि, मुदा दोसर दिस एकर किछु नकारात्मक प्रभाव सेहो देखबाक भेटि रहल अछि ।

परम्परागत मिथिला समाजमे बरियातीमे महिलाक सहभागिता सीमित छल । सामाजिक मर्यादा, सुरक्षा तथा तत्कालीन सामाजिक संरचनाक कारण अधिकांश महिलासभ विवाहस्थल धरि नहि जाइत छलि ।

किन्तु समय परिवर्तनके संग महिलाक सहभागिता बढ़ल अछि । शिक्षित, आत्मनिर्भर आ सामाजिक रूपेँ सक्रिय महिलासभ आब बरियातीमे सहभागी भऽ रहल छथि ।

तथापि एहि सहभागिताक संग सांस्कृतिक मर्यादा, लोकाचार तथा पारिवारिक गरिमाके संरक्षण सेहो आवश्यक अछि । आधुनिकता आ परम्पराके बीच संतुलन बनौने राखब मिथिला समाजक सामूहिक दायित्व अछि ।

बरियाती मूलतः वरपक्षक प्रतिनिधिमण्डल मानल जाइत छल, जाहिमे परिवारक वरिष्ठ पुरुष, अभिभावक आ समाजक प्रतिष्ठित व्यक्तिसभ सम्मिलित होइत छलाह । एहि व्यवस्थासँ विवाहक गरिमा, अनुशासन आ पारिवारिक उत्तरदायित्व स्पष्ट रूपसँ देखाइत छल । आब बरियातीक स्वरूप मनोरञ्जनप्रधान होइत जा रहल अछि, जाहिसँ विवाह संस्कारके गम्भीरता क्रमशः कम होइत देखाइत अछि ।         कतेको स्थानपर अत्यधिक भीड़, आधुनिक प्रदर्शन, अनावश्यक नृत्य–संगीत आ सामाजिक मर्यादासँ विपरीत गतिविधिके कारण विवाह समारोहके सांस्कृतिक गरिमा प्रभावित भऽ रहल अछि । मिथिलाक विवाह केवल उत्सव नहि, बल्कि एकटा संस्कार अछि; अतः एहि संस्कारमे मर्यादा, शालीनता आ परम्पराक संरक्षण आवश्यक अछि ।

ताहि लेल आवश्यक अछि जे महिला वा पुरुष—दूनू वर्गक सहभागिता रहय, मुदा मिथिलाक मौलिक संस्कृति, सामाजिक मर्यादा आ पारम्परिक मूल्यके संरक्षण सर्वोपरि मानल जाय । आधुनिकता अपन स्थानपर आवश्यक अछि, किन्तु सांस्कृतिक पहिचानके क्षय ककरो हितमे नहि हायत ।

विवाहक बरियाती मिथिलाक संस्कृति, सभ्यता, आत्मीयता, सामाजिक समरसता आ पारिवारिक सम्बन्धक जीवंत दस्तावेज अछि। एकरामे मिथिलाक लोकजीवन, लोकसंस्कृति, लोकगीत, पहिरन, भोजन, सम्मान आ सामुदायिक एकताक अद्भुत झलक भेटैत अछि ।

यद्यपि समयक संग बरियातीक स्वरूप बदलि रहल अछि, तथापि एकर मूल आत्मा अखनो जीवित अछि । आवश्यक अछि जे नव पीढ़ी एहि गौरवशाली परम्पराकेँ बुझय, अपनाबय आ संरक्षित करय, जाहिसँ मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता भावी पीढ़ी धरि सुरक्षित रहि सकय ।   बरियाती वास्तवमे केवल विवाहक एकटा रस्म नहि, बल्कि मिथिलाक आत्मा, संस्कार आ सभ्यताक जीवंत अभिलेख अछि ।

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