गोपाल झा , महोत्तरी , अषाढ २० गते
ओहि गमछामे सँ एक हम ओ गमछा छी , जकरा अहाँ सभ दिन काँन्ह पर रखने घुमैत छी, रौदमे माथ पर बाँन्हि लैत छी, पसिना पोंछि लैत छी, अतिथि अबैत छथि तँ सम्मानक प्रतीक बना दैत छी , आ काज सम्मन्न होइतहि खूंटी उपर टाँगि कय बिसरि जाइत छी ।
हमरा पर कखनो कोनो कविता नहि लिखल गेल, हमर सम्मानमे कखनो पुरस्कार नहि देल गेल, हमर नाम पर कोनो दिवस घोषित नहि भेल । मुदा हमरा एतबे संतोष अछि जे अहाँक सभ्यता जतेक पुरान अछि, ओतबे पुरान हमर संग सेहो अछि ।
हमर जन्म करघाक खटर–पटर ध्वनिमे होइत अछि । बुनकरके अँगुर जखन सूतकेँ तिरि कय बनबैत अछि, तखन हमर देह आकार लैत अछि । हमर प्रत्येक सुतमे श्रमिकक पसिना, स्त्रीक प्रार्थना, परिवारक आशा आ माटिक गन्ध बुनल रहैत अछि ।
हम जन्मे सँ जानैत छी—हमरा संग्रहालयमे नहि, लोकजीवनमे जीबयके अछि ।
हम कोनो राजा–महाराजाक मुकुट नहि छी, मुदा किसानक माथक छाँह अवश्य छी । हम कोनो मन्त्रीक कुर्सी नहि छी, मुदा मजदूरक काँन्हक सहारा अवश्य छी । हमरा उपर कखनो सोना–चानीक कढ़ाइ नहि भेल, मुदा पसिनाक नूनक चमक सदा रहैत अछि ।
मनुख बड़ा विचित्र जीव अछि ।
ओ हमरा “साधारण कपड़ा“ कहैत अछि । मुदा चैत बैसाखक रौद जखन माथ फोड़ैत अछि, तखन हमरा खोजैत अछि । जखन नहा कय बाहर अबैत अछि , तखन हमरा बिना अधूरा बुझैत अछि । पूजा करए बैसैत अछि तँ हमर शुद्धता चाहैत अछि । अतिथिक सम्मान करैत अछि तँ हमर गरिमा चाहैत अछि । मुदा काज सम्पन्न होइतहि फेर हम साधारण भय जाइत छी । एहि दुनियामे शायद उपयोगिताक सभसँ पैघ दण्ड उपेक्षा होईत अछि ।
हमरा सबसँ बेसी हँसी राजनीति पर अबैत अछि ।
चुनावक समय भाषन बेरमे हमर खूब पूछ होइत अछि । नेता हमरा काँँह पर राखिक जनताके बीच जाइ छथि । हमर सहारासँ अपन माटिसँ जुड़ल देखाबय चाहैत छथि । फोटो खिचाइत अछि, भाषण होइत अछि, नारा लगैत अछि । मुदा सत्ताक कुर्सी भेटिते सभ सँ पहिने हमरा त्याग क देल जाईत अछि । फेर हमर स्थान अलमारीक एकटा कोन वा गाड़ी पोछबाक कपड़ामे बदलि जाइत अछि ।
हम सोचैत छी—मनुख रंग बदलैत अछि कि गमछा ?
आधुनिकता सेहो कम मनोरञ्जक नहि अछि ।
विदेशी ब्राण्डक स्कार्फ गर्दैन पर सजैत अछि, मुदा घर आबिते ओहि स्कार्फकेँ उतारि कय हमरे खोजल जाइत अछि । कारण स्कार्फ फोटो सुन्दर बनबैत अछि, हम जीवन सहज बनबैत छी । फोटो आ जीवनक अन्तर शायद एतबे अछि । मिथिलामे त हमर कथा आरो अधिक गहीर अछि ।
विवाहमे वरक काँन्ह पर हम रहैत छी । पुरोहितके पूजा हमरा बिना पूर्ण नहि होईत अछि । कन्यादानक पवित्र क्षणमे हम साक्षी रहैत छी । नवदम्पतिक आशीर्वादमे हमर स्पर्श रहैत अछि । अतिथिक सम्मान हमरे माध्य सँ होइत अछि । मुदा जखन विवाहक चलचित्र बनैत अछि, निर्देशक कहैत छथि—“गमछा हटा दिअ, दृश्य आधुनिक नहि लागत ।
आधुनिकता यदि अपन जीड ़सँ लजाबए सिखबैत अछि, तँ ओ प्रगति नहि, विस्मृति अछि । हमर जीवनक अन्त सेहो विचित्रे होइत अछि ।
जखन हम नव रहैत छी , काँन्हक शोभा छी । किछु वर्ष बाद भनस घरके भतपसौना कपड़ा बैन जाईत छी । फेर गाड़ी पोछैत छी । अन्तमे जुत्ता चमकबैत–चमकबैत चुपचाप समाप्त भऽ जाइत छी । हमर कोनो शोकसभा नहि होइत अछि ।
मुदा हम मरैत नहि छि । हम फेर सूतक रूपमे, करघाक गीतमे, बुनकरक अाँगरमे, किसानक पसिनामे, नव गमछाक रूपमे जन्म लैत रहैत छी । हम सोचैत छी—असल अमरत्व स्मारकमे नहि, उपयोगितामे बसैत अछि ।
एखनो गामक कोनो बूढ़ बाबा हमरा बिना कतौ नहि जाइ छथि । एखनो किसान धान रोपैत बेर हमरा माथ पर बान्हैत अछि । एखनो कियो अतिथि अबैत छथि तँ सम्मानस्वरूप गमछा ओढ़ाओल जाइत अछि । एखनो मन्दिरमे पुजारी हमर उपयोग करैत छथि । तखन बुझाइत अछि—सभ्यता पूर्णतः समाप्त नहि भेल अछि; ओकर साँस एखनो चलि रहल अछि ।
हम कपड़ा नहि, लोकस्मृति छी । हम धागा नहि, पीढ़ीसभकेँ जोड़निहार सम्बन्ध छी । हम देहक घाम पसिना पोछैत छी, मुदा संगहि मनुखक अहंकार पर सेहो चुपचाप प्रश्नचिह्न लगा दैत छी ।
अहाँ कहैत छी—समाज बदलि रहल अछि ।
हम कहैत छी—बदलू, अवश्य बदलू । मुदा बदलैत–बदलैत एतेक दूर नहि चलि जाउ जे अपन काँन्ह पर राखल गमछा आ अपन माटिक गन्ध दुनू बिसरि जाउ । किएक तँ जखन मनुख अपन प्रतीक सभकेँ त्यागि दैत अछि, तखन ओ धीरे–धीरे अपन इतिहास, अपन संस्कृति आ अन्ततः अपनहि पहिचान गँवा दैत अछि ।
तेँ फेर एक बेर कहैत छी — हँ, हम गमछा छी ।
हम सम्मान छी, श्रम छी, अपनत्व छी । हम मिथिलाक लोकआत्माक ओ मौन शब्द छी , जे बजैत कम छि, मुदा सभक जीवनमे प्रतिदिन अपन उपस्थिति दर्ज करबैत रहैत छि ।
हँ, हम गमछा छी ।






